कार्तिक मेले पर थोप रहे कोरोना गाईड लाईन

उज्जैन : कार्तिक मेले के लिए प्रशासन कोई भी निर्णय नहीं ले पाया है। जबकि उप चुनाव में किसी भी तरह की गाईड लाईन का पालन नहीं किया जा रहा है तो फिर राजा विक्रमादित्य के समय से आयोजित हो रहे मेले पर रोक क्यों लगाई जा रही है। कार्तिक मेले में छोटे बड़े दुकानदार यहां पर अपनी दुकान लगाते हैं और नगर निगम दुकानों का आवंटन करती है ताकि दुकानदार यहां पर अपना व्यवसाय कर सके लेकिन 2 सालों से कार्तिक मेले का किसी भी प्रकार का आयोजन नहीं हो रहा है लेकिन अब उज्जैन में कोरोना पॉजिटिव का प्रतिशत शून्य हो गया है ऐसे में अब कम से कम इस बेरोजगार शहर को व्यवसाय करने का अवसर दिया जाना चाहिएमालवांचल की सांस्कृतिक विरासत की पहचान कार्तिक मेला आयोजन को लेकर शासन की ओर से अब तक कोई दिशा निर्देश जारी नहीं हुए हैं।

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कार्तिक मेला पर आश्रित छोटे-बड़े दुकानदारों ने तीन दिन पहले कोरोना गाइड लाइन का पालन करने का पत्र देकर मेला आयोजन करने की गुहार लगाई थी। इस संबंध में शासन की ओर से गाइड लाइन जारी नहीं हुई है। अब तक मेला आयोजन को लेकर किसी तरह की गाइड लाइन जारी नहीं हुई है। गौरतलब है कि यह मेला सम्राट विक्रमादित्य के समय से आयोजित हो रहा है। किंवदंती है सम्राट के पिता गर्दभिल्ल ने मेले की शुरुआत की थी। बाद में यह कार्तिक स्नान की धार्मिक परंपरा से भी जुड़ गया।

कार्तिक मेले का सांस्कृतिक इतिहास विक्रमादित्य कालीन है। आयोजन से शासकीय व्यवस्था का जुड़ाव 1912 से हुआ। नगर निगम में मौजूद रिकॉर्ड के अनुसार तत्कालीन उज्जैन नगर पालिका ने 1912 में पहली बार मेले की व्यवस्था अपने हाथ में ली थी। नपा के खर्च पर मेला लगाया।

कोरोना महामारी की वजह से लगातार यह दूसरा साल है जब कार्तिक मेला आयोजन निरस्त करने की स्थिति बनी है। बीते साल भी नगर निगम ने तैयारियां की मगर शासन की ओर से अनुमति नहीं दी गई। कोरोना संक्रमण काबू में आने पर इस साल मेला में व्यवसाय करने वाले दुकानदारों को उम्मीद थी कि मेला लगेगा लेकिन उनकी उम्मीद इस बार भी टूट रही है। व्यापारियों का कहना है कि सभी तरह के बड़े आयोजन गाइड लाइन के दायरे में किए जा रहे हैं फिर मेला लगाने पर आपत्ति क्यों है। चुनाव हो रहे हैं, राजनीतिक सभाएं हो रही हैं।

जुलूस, जलसे भी किए जा रहे हैं। फिर गाइड लाइन का पालन करने का भरोसा देने के बाद भी मालवांचल की सांस्कृतिक पहचान बन चुके कार्तिक मेला लगाने पर ही क्यों आपत्ति है।जबकि पहले भी विषम परिस्थितियां बनी न दंगों में मेला रुका न चुनाव आचार संहिता ने आयोजन में बाधा पहुंचाई। वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी हत्याकांड और 1992 में राम जन्मभूमि मामले को लेकर देश में अशांति के माहौल में भी मेला लगाया गया। व्यापारियों के अनुसार मेला उनकी वार्षिक आर्थिक जरूरतों की पूर्ति करता है। दो साल से आयोजन नहीं होने से वे कर्ज में फंसे हैं। बावजूद शासन उनकी परेशानी नहीं समझ रहा।

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