आज ही के दिन , यानी 17 अक्टूबर को रीलीज हुई फील्म गुर्जर आन्दोलन।

जो कई बाधाऐ आई, फीर भी कीस तरह मुसीबतो का कीया सामना।

पुरी कहानी डायरेक्टर अरुण नागर गुर्जर

अशोक गुर्जर की रिपोर्ट

गुर्जर समाज मे एक अलग नाम करने वाले।फील्मी जगत मे एक सीतारे की तरह चमकने वाले।फिल्म डायरेक्टर अरुण नागर ने बताया।
बात उन दिनों की है, जब नागर पुणे, महाराष्ट्र में एक सीरियल की शूटिंग कर रहे थे। तब ठंडी का वक्त था और राजस्थान में वीर गुर्जरों ने एक बार फिर पटरियां रोक दी थी, तब ईन्होने इसके बारे में पढ़ा और फिर गहराई से सोचा कि कितनी यातनाएं सही है मेरे समाज ने । उसी दिन ठान लिया था कि मैं अपनी पहली फिल्म इसी मुद्दे पर बनाऊंगा । जिसमे हमारा समाज पिछले 50 सालों से अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहा था ।

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अरुण नागर ने खुद ही इस फिल्म की कहानी लिखना शुरू कि। और मुंबई में प्रोड्यूसर्स को ये कहानी सुनानी शुरू कर दी । कुछ प्रोड्यूसर्स को ये कहानी पसंद भी आई, लेकिन बात अटक गई फिल्म के टाइटल (नाम) पर, उनका मानना था कि इस फिल्म का नाम सिर्फ आंदोलन होना चाहिए, लेकिन वो जिद पर अड़े था कि ये फिल्म बनेगी तो गुर्जर नाम से ही बनेगी, मतलब फिल्म का नाम होगा गुर्जर आंदोलन, बिलकुल वैसा ही जैसे आजकल मिहिरभोज बाबा के नाम के आगे से कुछ लोग गुर्जर शब्द को हटाने का प्रयास कर रहे है, खैर बात नही बनी और प्रोड्यूसर्स ने मेरी फिल्म में पैसे लगाने से हाथ पीछे खींच लिए, उनका मानना था कि गुर्जर शब्द के लगने से ये सिर्फ जातिवाद पर आधारित फिल्म बन जायेगी लेकिन उन्होने कुछ उदाहरण दिए, जैसे राउडीराठौड़, सिंहइजकिंग, सनऑफसरदार, पानसिंह_तोमर ये फिल्में भी तो जातिसूचक नामों को दर्शाती है, तो फिर GurjarAandolan क्यों नहीं हो सकती ।

खैर बात नही बनी और अंत में उनके सामने दो रास्ते बचे थे, एक या तो इस प्रोजेक्ट को बनाने का ख्याल छोड़ दे, या फिर अपने दम पर इस प्रोजेक्ट को बनाए । पहला वाला ऑप्शन ज्यादा आसान था लेकिन उन्होने मुश्किल वाले ऑप्शन को चुना और खुद ही इस महान फिल्म को बनाने का निश्चय लिया ।

ये काम सुनने में आसान लग रहा था।लेकिन इसे करने में लाख मुसीबतें आई, अपने और परायों का बोध हुआ ।नागर ने बताया की जिन लोगों, महासभा, समाज के धन्ना सेठ और गुर्जर नेताओं से मैने मदद की उम्मीदें लगाकर ये बीड़ा उठाया था, उन्होंने उन्हे सिर्फ झूठे दिलासे ही दिए, लेकिन जिन लोगो से बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी, उन्होंने उनकी बहुत मदद की और वो लोग थे। समाज का निम्न, मध्यम वर्ग, जिनके पास उनको देने के लिए ढेर सारा आशीर्वाद था, सहयोग था, लाड था, प्यार था, जिसकी उन्हे उस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी।
नागर ने कहा की इस फिल्म को बनाने की लड़ाई बहुत लंबी थी। और लगभग 2 से 3 साल की कड़ी मेहनत के बाद यह फिल्म कंप्लीट हो सकी।

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लेकिन मुसीबतें खत्म नहीं हुई थी बल्कि शुरू हुई थी । रिलीज से पहले ही इस फिल्म पर उस वक्त की राजस्थान सरकार ने बैन लगा दिया, सिनेमा से इसके पोस्टर हटा दिए गए, सिनेमा मालिकों को सख्त हिदायत दी गई कि इस फिल्म को रिलीज नही किया जाए ।
लेकिन मन में एक सवाल था कि क्या हमारे समाज के लोग इस फिल्म को वाकई देखना चाहते है, फीर उन्होने फरीदाबाद में फिर से इसे रिलीज किया। समाज ने इस फिल्म को हाउसफुल करार दे दिया, लोगों ने खूब दिल से 7 दिनों तक फरीदाबाद में मल्टीप्लेक्स सिनेमा में इस फिल्म को देखा ।

उनकी जो उम्मीदें टूट चुकी थी, उन्हे लोगो ने फिर से रोशन कर दिया। इससे उत्साहित होकर फिर उन्होने इसे YouTube पर रिलीज किया । वहां भी कई बार स्ट्राइक मारकर इस फिल्म को डिलीट कराने के प्रयास हुए, लगभग 6 बार यह फिल्म यूट्यूब से डिलीट हुई । लेकिन हर बार लोगो ने इस फिल्म को बढ़ चढ़कर देखा।

आज 7 साल बाद भी लोग उन्हे। इसी गुर्जर आंदोलन फिल्म के नाम से ही जानते है।

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