काव्य गोष्ठीःभारतीय संस्कृति के जो प्रतीक हैं अनुपम, उन्हें प्रणाम।

जय-जय कौसल्या-नंदन, दशरथ के तनय, सिया के राम।।

ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में कवियों ने बटोरीं वाहवाही

गया से डॉ रश्मि ने दी प्रस्तुति

गया। साहित्यिक संस्था “शब्दाक्षर” की ओर से नवरात्रि तथा विजयादशमी के पावन अवसर पर “जय माँ अम्बे, जय श्री राम, शब्दाक्षर का दिव्य प्रणाम” विषय पर अॉनलाइन काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका संचालन शब्दाक्षर कर्नाटक इकाई की अध्यक्ष प्रसिद्ध लोकगीतकार सुनीता सैनी गुड्डी ने किया तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता उपाध्यक्ष विजेंद्र सैनी ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ पल्लवी शर्मा द्वारा प्रस्तुत मधुर सरस्वती वंदना से हुआ।

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इस काव्यगोष्ठी में देश के विभिन्न शहरों से जाने माने कवि-कवयित्रियों ने माँ अम्बे तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र को समर्पित अपनी रचनाएँ पढ़ीं। डॉ रश्मि प्रियदर्शनी की कविता “भारतीय संस्कृति के जो प्रतीक हैं अनुपम, उन्हें प्रणाम, जय-जय कौसल्या-नंदन, दशरथ के तनय, सिया के राम” ने पूरे मंच को भक्तिमय बना डाला। महावीर सिंह ‘वीर’ की “रावणों के दहन के लिए साथियों, राम-सा आचरणयुक्त बल चाहिए, पर्वतों सा इरादा अटल चाहिए, त्याग का भाव दिल में प्रबल चाहिए” पंक्तियों ने श्रोताओं की खूब वाहवाहियाँ बटोरीं।

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इस काव्यगोष्ठी में शब्दाक्षर के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सत्येन्द्र सिंह सत्य, शब्दाक्षर दिल्ली की प्रदेश अध्यक्ष संतोष संप्रीति,तेलंगाना की प्रदेश अध्यक्ष सुनीता नारायण,उत्तर प्रदेश अध्यक्ष श्यामल मजूमदार,गोवा की प्रदेश अध्यक्ष वंदना चौधरी, झारखंड से सुबोध कुमार झा, सौरभ सैनी, सुशील कुमार, प्रीति राही, पूनम शर्मा, मधु श्रीवास्तव, डॉ रौशनी किरण, पुनीता सिंह, प्रदीप कुमार, ज्योति नारायण, सुबोध कुमार झा, अंजू छारिया तथा कार्यक्रम संचालक सुनीता सैनी गुड्डी ने भी अपनी एक से बढ़कर एक रचनाएँ पढ़कर मंचासीन अतिथियों तथा सभी श्रोताओं से खूब तारीफें लूटीं। काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे सैनी ने ‘माँ के आँचल से बड़ा कोई आशियाना नहीं होता, माँ की लोरी से बड़ा कोई गाना नहीं होता’ कविता की कर्णप्रिय प्रस्तुति दी।

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