नवपद की आराधना में हुई सिध्दपद की साधना

शाश्वती है नवपद की आराधना- आचार्य मुक्तिसागर सूरिजी मसा

उज्जैन नवपद आयंबिल ओलीजी की ये अट्ठाई शाश्वती अट्ठाई कहलाती है। पर्यूषण की अट्ठाई शाश्वती नहीं है। पर्यूषण महापर्व हमारे इधर मनाये जाते हैं, महाविदेह क्षेत्र में नहीं, देवलोक में भी नहीं, यहां भी अभी मनाये जा रहे हैं, पांचवें आरे के बाद छठे में नहीं होंगे। जबकि आयंबिल ओली की आराधना यहां भी हो रही है, महाविदेह क्षेत्र में भी हो रही है, देवलोक में भी आयंबिल भले नहीं होते हो किंतु दर्शन और ज्ञान की आराधना तो होती ही है। नवपद की आराधना अभी ही नहीं हजार साल, लाख साल या करोड़ साल बाद भी होगी।

ये बात मालव मार्तंड पू. आचार्य श्री मुक्तिसागरसूरिजी महाराज ने श्री ऋषभदेव छगनीराम पेढ़ी खाराकुआ उपाश्रय में अपने प्रवचन के दौरान कही। आपके सानिध्य में यहां पर नवपद ओली की आराधना हो रही है जिसमें उज्जैन एवं बाहर के करीब 250 आराधक जुड़े हैं। ओलीजी के दूसरे दिन सिध्दपद की साधना में आपने कहा कि अरिहंत और सिध्दपद दो ही हमारे देव  तत्व हैं, एक साकार और दूसरे निराकार।

दुनिया एक भगवान को मानती है, कहते हैं कि ईश्वर एक हैं उनके रूप अनेक हैं। जबकि जैन धर्म कहता है कि हर कोई आत्मा साधना करके मोक्ष पा सकता है और भगवान बन सकता है। आपने कहा कि अनादिकाल से हमें इस संसार में भटकाने का कार्य हमारे अंदर रहे विराधक भाव कर रहे हैं उसमें पहले नंबर में स्वार्थांधता है। इसके लिए अरिहंत रूप परार्थता की शरण में जाना होगा। दूसरे नंबर में देहाध्यास है जो कि हमें आत्मध्यान लगाने नहीं देता। काया की माया हमारे पीछे पड़ी है। सिध्दपद की साधना से हमारे अंदर से ये भाव खत्म होकर आत्मभाव जागृत होता है।

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