बिपिन रावत ने कहा कि सीमा पर चीन ने कोई मिसएडवेंचर किया कि नहीं, इसका जवाब केवल समय देगा. news18

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नई दिल्ली. देश कोरोना वायरस संकट से जूझ रहा है और महामारी से निपटने में भारतीय सैन्य बलों के तीनों अंगों ने महती भूमिका निभाई है. चाहे ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की सप्लाई हो या मेडिकल उपकरणों की, भारतीय वायुसेना दिन रात उड़ानें भरी हैं, तो नौसेना ने विदेशों से मदद के तौर मिले उपकरण और सामानों को स्वदेश लाने का काम युद्ध स्तर पर किया है. सेना के रिटॉयर्ड मेडिकल कर्मचारी संक्रमण से निपटने में नागरिक संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. महामारी में सैन्य की भूमिका और उनके प्रयासों के साथ कई मुद्दों पर न्यूज18 की मारिया शकील ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत के साथ बात की. मारियाः सर कोरोना महामारी के खिलाफ भारतीय सैन्य बल कंधे से कंधा मिलाकर संक्रमण से निपटने की लड़ाई लड़ रहे हैं. अब तक का अनुभव कैसा रहा? क्योंकि डीएमए ने ये मेंशन नहीं किया है कि महामारी की स्थिति में आर्मी की सेवाएं ली जा सकती हैं. सीडीएसः मौजूदा स्थितियों में देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है और ऐसी ही स्थितियों में सैन्य बलों ने देश और लोगों की मदद करने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए. आपने खासतौर पर 2005 के आपदा प्रबंधन कानून का जिक्र किया, जिसमें किसी खास महामारी को आपदा के रूप में रेखांकित नहीं किया गया है. लेकिन, जिस तरह के संकट का हम सामना कर रहे हैं, यह किसी आपदा से कम नहीं है. ऐसे में सैन्य बलों सहित किसी भी संगठन को सरकार और देशवासियों की मदद के लिए आगे आना चाहिए और अपनी तरफ से हरसंभव मदद करनी चाहिए और सैन्य बलों ने यही किया. मैं कहना चाहूंगा कि रक्षा मंत्रालय ने इस लड़ाई में आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी निभाई और जब भी हमें लगा कि महामारी का दायरा बढ़ने वाला है और यह आपदा बन सकती है. रक्षा मंत्री ने जिम्मेदारी उठाते हुए सबको एकजुट किया. सभी सचिवों को साथ लिया और सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों के साथ वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिए यह सुनिश्चित किया कि कैसे हम खुद को बचा सकते हैं. कैसे लोगों को सुरक्षित किया जा सकता है और किस तरह फ्रंटलाइन सैनिकों को सुरक्षित रखते हुए पूर्व सैनिकों और आम नागरिकों की मदद की जाए. इसलिए मुझे लगता है कि शुरू में ही एहतियाती कदम उठाने और रक्षा मंत्रालय के साझा प्रयासों के जरिए हम यहां तक पहुंच पाए हैं. मारियाः सर ये दुर्योग है कि वायरस संक्रमण सबको अपनी चपेट में ले रहा है. क्या हमारे पास कोई आंकड़ा है कि वायरस संक्रमण का सेना के तीनों अंगों आर्मी, एयरफोर्स और नेवी के हमारे जवानों पर कैसा असर रहा? और संक्रमण से निपटने के लिए सैन्य बलों ने किस तरह प्रोटोकॉल फॉलो किया.सीडीएसः सैन्य बलों को हमने तीन समूहों में विभाजित किया. एक फ्रंटलाइन सोल्जर्स जोकि सीमा पर तैनात हैं, जिन्हें किसी भी खतरे की स्थिति में तैयार रहना है. इसके बाद वो लोग जो फ्रंटलाइन सैनिकों को मदद कर रहे हैं, ताकि फ्रंटलाइन सैनिक ऑपरेशन के लिए हमेशा तैयार रहें और इसके बाद वे लोग जो दिल्ली, पुणे, कोलकाता जैसे अन्य शहरी इलाकों में तैनात हैं. दूसरी ओर केंद्र सरकार ने तय किया कि टीकाकरण के मामले में सैन्य बलों को प्राथमिकता मिले और हमने तय कि हर सैनिक, नौसैनिक और एयरमैन को सही टाइम पर वैक्सीन की दोनों खुराक मिले. हम यह कह सकते हैं कि सैन्य बलों के 95 फीसदी जवानों को वैक्सीन की दोनों खुराक दी जा चुकी हैं. बाकी उन्हीं लोगों को टीका नहीं लगा है, जो वायरस संक्रमण के शिकार हो गए थे. जैसे ही उनका इलाज पूरा होता है, उन्हें भी वैक्सीन बची खुराक दी जाएगी. संक्रमण से निपटने के लिए सबसे पहले हमने फोर्स को बचाना सुनिश्चित किया. इसके बाद वे लोग जो उनकी मदद करते हैं. इन लोगों को हमने संक्रमण से बचाने के लिए बिल्कुल सख्त नियम बनाए. लगभग बैलून में रखा, ताकि फ्रंटलाइन सैनिकों के साथ उनका संपर्क ना हो. फ्रंटलाइन सैनिकों ने शब्दशः प्रोटोकॉल का पालन किया और जब भी वे फॉरवर्ड इलाकों में गए उन्हें क्वारंटीन किया गया. इसके साथ ही अगर वे छुट्टियों से लौटे तब भी उन्हें क्वारंटीन किया गया. इस तरह संक्रमण को रोकने के लिए कई उपाय किए गए. वहीं घनी आबादी वाले इलाकों जैसे कि दिल्ली, पुणे, मुंबई और अन्य बड़े शहरों में कुछ जवान संक्रमित हुए हैं. लेकिन मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगा कि संक्रमण का सैन्य कर्मियों पर उतना असर नहीं रहा है, जैसा कि आम नागरिकों पर देखने को मिला है. मुझे लगता है कि जिस तरह कि स्वस्थ जीवन शैली, शारीरिक अभ्यास का दैनिक रूप से सैन्य बलों में पालन होता है, उससे काफी मदद मिली है. मैं तो यहां तक कहना चाहूंगा कि पिछले कुछ सालों में योग सैन्य बलों कि फिजिकल ट्रेनिंग कुरिकुलम का हिस्सा बन गया है और सभी जगहों पर इसका पालन किया जाता है. कह सकते हैं कि जिस तरह की डाइट सरकार हमें प्रदान कराती हैं, उसके साथ ही योग और शारीरिक एक्टिविटी के चलते वायरस संक्रमण का सैन्य बलों में ज्यादा प्रकोप देखने को नहीं मिला है. हालांकि जब हम ये कहते हैं कि फोर्स को बचाने में हम कामयाब रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि हमारे जवान संक्रमित नहीं हुए हैं. उन्हें भी संक्रमण हुआ है. मैं कोई आंकड़ा नहीं देना चाहूंगा लेकिन ये बताना चाहूंगा कि जिस तरह आम लोगों पर महामारी का असर देखने को मिला है, वैसा नहीं है. मारियाः सर जैसा कि कोविड संक्रमण को काबू करने के लिए तीनों सेनाओं ने आम नागरिकों और राज्य सरकारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है, तो किस तरह की समस्याएं सामने आई हैं? सीडीएसः दूसरी अन्य एजेंसियों और संगठनों की तरह हमें भी शुरूआत में मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि दूसरों की तरह हमें भी उम्मीद नहीं थी कि महामारी इस पैमाने पर फैल जाएगी. हमारे अस्पताल अपने जवानों और उनके परिवार का ख्याल रखने के लिए पूरी तरह तैयार थे. लेकिन, पूर्व सैन्य कर्मी भी हम पर निर्भर हो गए और ना केवल सिर्फ अपने इलाज के लिए बल्कि अपने परिजनों के लिए भी. पहले हमने अपने जवानों को टारगेट किया, फिर रिटायर्ड सैन्य कर्मी और उनके परिजनों और उसके बाद आम नागरिकों को भी हमने मदद की. शुरू में हमारे पास बहुत ज्यादा संसाधन नहीं थे. हमें अपने संसाधनों को तैयार करना पड़ा, क्योंकि सैन्य बलों के पास कॉम्बैट मेडिकल सपोर्ट प्लान होता है, जिसे कन्वेंशनल ऑपरेशन के लिए तैयार किया जाता है. ऐसे स्थितियों में हमें अपने प्लान एक्टिवेट करने पड़े और एक बार प्लान शुरू होने के बाद हमने डिमांड और सप्लाई को मैच कर लिया. हां, दूसरे अन्य लोगों की तरह हमने अपना ऑक्सीजन उत्पादन नहीं किया. हम ऑक्सीजन सप्लाई के लिए सिविलियन सोर्स पर निर्भर थे, लेकिन हमारे पास ट्रांसपोर्ट के बेहतर साधन उपलब्ध थे. हमने कोशिश की कि ऑक्सीजन की कमी को समय रहते पूरा किया जाए और ऑक्सीजन की कमी को कम से कम रखा जाए. इस तरह हमने समय पर चरणबद्ध तरीके से स्थिति को संभालने में सफल रहे. हालांकि शुरू में हमें भी थोड़ी परेशानियां आई थीं.
मारियाः सर अगर महामारी के खिलाफ लड़ाई को देखें तो हमारे पास ट्रेनिंग प्राप्त मेडिकल प्रोफेशनल्स, डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ की कमी देखने को मिली है. ऐसे में इस कमी को पूरा करने के लिए सैन्य बलों को कहा गया. कई सारे विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से संक्रमण के निपटना आसान हो गया. आप क्या कहेंगे इस बारे में. सीडीएसः मैं कहूंगा कि हमारे लिए ये बढ़िया एक्सरसाइज रही. हम जंग की तैयारियों के लिए नियमित तौर पर ऐसे अभ्यास करते हैं और कॉम्बैट मेडिकल सपोर्ट हमारी मेडिकल तैयारियों का हिस्सा है. इसलिए महामारी के समय हम अपने संसाधनों और फील्ड अस्पतालों को एक समय में मोबिलाइज करने में सफल रहे. हमें कुछ खामियां भी मिलीं, जिसके चलते रिजर्व डॉक्टरों, रिजर्व मेडिकल स्टाफ और अन्य लैब टेक्निशियंस को बुलाना पड़ा. सैन्य बलों के लिए ये महामारी एक बढ़िया एक्सरसाइज रही, जिसके जरिए हमने अपनी तैयारियों की समीक्षा की. एसओपी का रिव्यू किया. साथ ही ये सबक भी मिला कि भविष्य में ऐसी महामारियों के लिए तैयार रहा जाए और उसी समय कॉम्बैट मेडिकल सपोर्ट की भी तैयारी रखी जाए. हमें इस महामारी को एक मौके के रूप में देखना चाहिए क्योंकि हमें मेडिकल कॉम्बैट की तैयारी करनी है और जिस तरह हमने इस बार काम किया है, उसमें काफी सफलता मिली है. हमें उसी गुणवत्ता के साथ काम किया, जैसाकि रक्षामंत्री ने हमें निर्देश दिया था. सीडीएस और डीएमए के पास बहुत स्पष्ट चार्टर है, जिसके आधार पर डिफेंस टीम अपने ऑपरेशन को अंजाम देती है. इस काम में हमें डीआरडीओ का भी सहयोग मिला. मारियाः इंडियन एयरफोर्स और नौसेना ने जीवनदायी मेडिकल ऑक्सीजन और उपकरणों को लाने ले जाने में बड़ी भूमिका निभाई है. क्या आप हमें इन लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन के बारे में बता सकते हैं कि इन्हें अंजाम देने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा और हमने क्या सबक सीखे. सीडीएसः भारतीय नौसेना के पास बड़े जहाज हैं, जिन पर बड़े मात्रा में सामान ढोया जा सकता है, तो विदेशों से जब सामान लाने की बात हुई तो नौसेना ने जिम्मेदारी ली. ऐसे ही अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप को भी ऑक्सीजन, कंसंट्रेटर्स, ऑक्सीजन सिलिंडर्स और भारी मशीनों की जरूरत पड़ी तो नौसेना ने फिर जिम्मेदारी उठाई. ऐसे ही किनारे से दूसरे किनारे भारी सामान ले जाने के लिए नौसेना के पास बेहतर संसाधन थे. वायुसेना के पास ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट हैं, जिनके जरिए भारी सामान ढोया जा सकता है. इन मालवाहक जहाजों में भारी टैंक और ऑर्टिलरी बंदूकों को ढोने का काम किया जाता है. ऐसे में इन जहाजों का प्रयोग ऑक्सीजन टैंकर्स के ट्रांसपोर्टेशन में किया गया. विदेशों से जल्दी सामान लाने के लिए भी एयरफोर्स ने उड़ान भरी तो देश में एक इलाके से दूसरे इलाके में सामान लाने ले जाने के लिए भी एयरफोर्स ने जिम्मेदारी उठाई. हालांकि इस दौरान गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय का भरपूर सहयोग मिला. तीनों सेनाओं के बीच तालमेल के लिए डायरेक्टर जनरल ऑर्म्ड फोर्सेस मेडिकल सर्विसेस के दफ्तर में एक कोविड मॉनिटरिंग सेल बनाया गया था. साथ ही पालम एयरपोर्ट पर एयर सपोर्ट सेल भी काम कर रहा था. अगर कोई सामान बाहर से आ रहा है और देश में किसी इलाके पर भेजा जाना है तो इसके लिए भारतीय सेना को जिम्मेदारी दी गई थी. इस तरह एक साझा तरीके से सबके सहयोग के जरिए को-ऑर्डिनेशन काम कर रहा था और जहां भी जरूरत होती, भारतीय सेना जिम्मेदारी निभाती. मारियाः डीआरडीओ, पैरा मिलिट्री और अन्य रक्षा कंपनियों के साथ आईटीबीपी ने अग्रिम मोर्च पर महामारी के खिलाफ अपनी भूमिका निभाई है. दवा बनाने के मामले में भी डीआरडीओ ने बेहतरीन काम किया है और अब उनकी बनाई कोरोना की एक दवा भी हमारे पास है. आईटीबीपी देश में सबसे बढ़िया कोविड सेंटर्स चला रही है. क्या आप महसूस करते हैं कि भविष्य में किसी महामारी या प्राकृतिक आपदा के समय इस तरह सभी संस्थाओं को मिलाकर काम करने का जो अनुभव रहा है, उसे इस्तेमाल किया जाना चाहिए. सीडीएसः बिल्कुल. रक्षा मंत्रालय में हमने एक मंत्रालय के तौर पर काम किया और सभी संसाधनों को महामारी के खिलाफ लड़ाई में अपनी ताकत लगाने को कहा. चाहे वह डीआरडीओ हो या रक्षा उत्पादन करने वाली कंपनियां, चाहे वह डीपीएसयू हो या ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज. कोविड संकट के चलते समस्या होने के बावजूद सबसे कदम बढ़ाए और देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए काम किया. डीआरडीओ की खास तौर पर तारीफ की जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने क्रायोजेनिक ऑक्सीजन जनरेटर्स को जिस तरह विकसित किया है, वो बेमिसाल रहा है. लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के लिए ऑक्सीजन जनरेट करने की जरूरत होती है और क्रायोजेनिक ऑक्सीजन जनरेटर्स इस काम को बखूबी करते हैं. अब इनका इस्तेमाल अस्पतालों में ऑक्सीजन पैदा करने के लिए किया जा रहा है. डीआरडीओ की तरह डीपीसीयू और ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों ने ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स सहित तमाम जरूरतमंद उपकरण बनाकर अपनी भूमिका निभाई है. मुझे लगता है कि ये बहुत ही सकारात्मक कदम है. सशस्त्र बलों, पैरा मिलिट्री फोर्सेज और आईटीबीपी ने देशवासियों के हित में बेहतरीन सुविधाओं का संचालन किया है. मुझे लगता है कि महामारी से एक बढ़िया सबक हमें मिला है, इस तरह की समस्याएं हमें भविष्य के लिए समाधान उपलब्ध कराती हैं. मुझे लगता है कि इस संकट से सबक लेकर सरकार महामारी से निपटने के लिए नए उपाय लेकर आएगी. हो सकता है कि आपदा प्रबंधन एक्ट 2005 को और मजबूत किया जाएगा और आगे जरूरत पड़ी तो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को जिम्मेदारी दी जाएगी. मुझे लगता है कि सबको मिलकर सरकार के साथ काम करना चाहिए. डीआरडीओ की वैक्सीन आ रही है. उन्होंने जो दवाई बनाई है, वो एक बेहतरीन काम है. डीआरडीओ हमेशा से रिसर्च और डेवलपमेंट पर काम करता रहा है. ऐसा होता नहीं कि आपको हर रिसर्च और विकास में कामयाबी मिले. लेकिन इस बार डीआरडीओ सफल रहा है. हमें डीआरडीओ को शुक्रिया कहना चाहिए जिस तरीके से देश की मदद के लिए उन्होंने काम किया है. मारियाः सर कोरोना वायरस कहां से आया ये अभी तक पता नहीं चल पाया है. बहुत सारे वैज्ञानिकों का कहना है कि चीन के लैब से वायरस के लीक होने की खबरों को खारिज नहीं किया जा सकता और इसे गंभीरता से लेना चाहिए जब तक गहन जांच का डाटा उपलब्ध नहीं होता है. क्या आप इस बात से सहमत हैं. क्या ये संभव है कि कोविड बॉयोलॉजिकल वारफेयर का हिस्सा हो सकता है और क्या आप मानते हैं कि जांच को लटकाकर चीन अपना ही अहित कर रहा है? सीडीएसः मुझे लगता है कि हमें किसी तरह का अनुमान नहीं लगाना चाहिए. ऐसी स्थिति में यह गलत होगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस बारे में चिंता जताई है. मुझे लगता है कि इसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि हम खुद अंतरराष्ट्रीय समुदाय का हिस्सा हैं और जो भी उनकी जांच में सामने आता है, उसी के आधार पर हमें चीजों को समझना चाहिए कि महामारी कैसे फैली. हमें अभी कोरोना के उत्पन्न होने को लेकर चल रहीं जांचों का इंतजार करना चाहिए और जो भी परिणाम आए उन्हें सबको स्वीकार करना चाहिए और अगर संक्रमण किसी एक देश से फैला है तो यह देखना होगा कि यह गलती से फैला है या प्राकृतिक रूप से, लेकिन संबंधित पक्षों को कोशिश करनी चाहिए कि भविष्य में ऐसा संक्रमण ना फैले. मारियाः सर बीजिंग के साथ सीमा विवाद की छाया संक्रमण के दौर में चीन द्वारा की गई मदद की पेशकश पर भी है. चाहे वह वैक्सीन के ग्लोबल टेंडर की बात हो या अन्य क्षेत्रों में सहयोग की. भारत ने चीन पर आर्थिक पाबंदियां लगाई हैं. आप इन सबको कैसे देखते हैं और क्या आपको लगता है कि पड़ोसियों के साथ बीजिंग जिस तरह से व्यवहार करता है, उसमें कोई अंतर आने वाला है. सीडीएसः मैं इस सवाल का जवाब सरकारी एजेंसियों पर छोड़ता हूं. मुझे लगता है कि विदेश मंत्रालय और सरकार इस पूरे मामले को देख रहे हैं. अगर हमें किसी देश से मदद की दरकार है तो इस बारे में राजनीतिक नेतृत्व को फैसला लेना है. इस समय सबकी कोशिश है कि वैक्सीन की सही समय पर उपलब्धता बनी रहे और हमारी ज्यादा से ज्यादा आबादी को टीका लग जाए. इस सवाल का जवाब मैं राजनीतिक नेतृत्व पर छोड़ता हूं. मारियाः अगर चीन के साथ लगी उत्तरी सीमा की बात करें तो भारत ये साबित कर दिया है कि उत्तरी सीमा पर उसे पीछे नहीं धकेला जा सकता. अब तब हमने जो हासिल किया है, वो ये कि सीमा पर यथास्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. इस मामले में हमें वैश्विक समर्थन भी मिला है. क्या ये कहा जा सकता है कि चीन द्वारा सीमा पर की गई हरकतों से बीजिंग ने खुद का ही अहित किया है. इस बारे में आप क्या सोचते हैं? सीडीएसः वास्तव में, सशस्त्र बलों को सरकार ने एक टास्क दिया था और टास्क ये था कि हमें अपने सीमाओं की सुरक्षा करनी है. हमें अपनी जमीन का एक इंच भी गंवाना नहीं है. मैंने और सभी सर्विस चीफ ने भी यह कहा था कि हमें पूरी तरह तैयार रहना है. किसी भी मिसएडवेंचर का जवाब सख्ती के साथ दिया जाएगा. तीनों सेनाओं के संसाधनों का उपयोग करते हुए हम मोर्चा संभाले खड़े रहे और तय किया कि साझा तरीके से टास्क को अंजाम दिया जाए. चीन ने कोई मिसएडवेंचर किया कि नहीं, इसका जवाब केवल समय देगा. आज की तारीख में हम मोर्चा संभाले हुए हैं और किसी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे. मारियाः चीन के साथ सीमा विवाद पर बातचीत की क्या स्थिति है और कबतक इसके समाधान की उम्मीद है? पिछले साल क्या हुआ था? सीडीएस: सीमा विवाद का समाधान एक जटिल मुद्दा है. चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर जटिलता को हमें समझना होगा. ये एक रात में समाधान होने वाला मुद्दा नहीं है. इसलिए इसके समाधान में कितना वक्त लगेगा इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है. सीमा विवाद के समाधान के लिए सभी प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं. जब भी सीमा विवाद का समाधान पर बात होती है तो कोई भी देश रणनीतिक एडवांटेज वाली स्थिति को छोड़ना नहीं चाहता है. सरकार के हिसाब से सीमा विवाद का समाधान होगा. सीमा विवाद पर दोनों देश कैसे आगे बढ़ेंगे या वक्त बताएगा. मारिया: चीनी मीडिया के हवाले से खबर है कि भारतीय सीमा के करीब उसने अपने उपकरणों को अपडेट किया है? सीडीएस: आर्मी चीफ ने कहा था कि हम सीमा पर बराबरी की तैनाती कर रहे हैं. लद्दाख में हमारे पास 390 टैंक हैं. ये टैंक भारी और बेहतरीन हैं और दुनिया में किसी भी हल्के टैंक को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं. चीन के पास भले ही बेहतर तकनीक हो लेकिन हम ज्यादा ढृढ़ हैं और हमारी सेना भी. इसके अलावा हमारी तरफ हमें अपने इलाके का भी लाभ मिलता है. हिमालयन रेंज में हमारे जवान ऊंचाई वाले इलाके में मजबूती से डटे हुए हैं. हमारे पास बड़ी बढ़त है. इसके अलावा ऊंचाई की दृष्टि से हमारी वायुसेना के पास भी बढ़त है. हमें चीन के उपकरणों से ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है. मारिया: सरकार ने कोविड मरीजों के लिए तीनों सेनाओं को अस्पताल और क्वारंटाइन सुविधाओं के लिए आपात वित्तीय ताकत भी दी है. क्या आपको लगता है कि स्थानीय कमांडरों को वित्तीय और निर्णय लेने की आजादी से कोविड कर्व को रोका जा सकता है? सीडीएस: कोरोना की पहली लहर के दौरान भी कमांडरों को ऐसी ही ताकत दी गई थी और इसी कारण हमने इसे आगे बढ़ने से रोक दिया था. मेडिकल उपकरण खरीदना, ये इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए उपकरण खरीदने का हमें फायदा मिला. एकबार फिर रक्षा मंत्री ने सेना और उनके कमांडरों को यह ताकत दी है. इस ताकत के कारण लोकल कमांडरों को जिस भी चीज की जरूरत होती है वह उसे तुरंत खरीद सकते हैं. इसका बहुत लाभ मिला है. क्योंकि हर क्षेत्र को अलग-अलग सुविधाओं की जरूरत होती, किसी खास इलाके में वेंटिलेटर की जरूरत होती है वहीं, किसी दूसरे इलाके में ज्यादा पीपीई किट खरीदने की जरूरत होती है. आपको अलग-अलग सेक्टर से अलग-अलग जरूरत होती है और इसमें लाभ ये है कि जूनियर कमांडर्स और लोकल फॉर्मेंशन कमांडर्स को ये चीजें खरीदने की ताकत दी गई है. मारिया: हमें समय देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद जनरल रावत सीडीएस: आपका भी बहुत-बहुत धन्यवाद. आपसे बात करके अच्छा लगा. मैं आपके जरिए देशवासियों को यह संदेश देना चाहता हूं कि भारतीय सेना देशवासियों के साथ हमेशा खड़ी है. हम देश की सेना हैं. हम देश के साथ खड़े रहते हैं. अपने देशवासियों की रक्षा के लिए हम सैदव तत्पर रहते हैं.



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