अफगानिस्तान का बड़ा हिस्सा गृहयुद्ध जैसे हालात का सामना कर रहा है- सांकेतिक फोटो

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अफगानिस्तान का बड़ा हिस्सा गृहयुद्ध जैसे हालात का सामना कर रहा है, जहां लगातार विस्फोट और हमले हो रहे हैं. अफगानिस्तान के इन हालातों से पाकिस्तान चिंता में है. दरअसल बढ़ती आतंकी घटनाओं के पीछे इस बात को जिम्मेदार माना जा रहा है कि हाल ही में वहां से दशकों से तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया गया. अब सैनिकों का लौटना पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी अस्थिरता पैदा कर सकता है. इस वजह से बिताए बीते दो दशक  अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने सैनिकों से इस साल के 11 सितंबर तक अफगानिस्तान छोड़कर देश लौट आने को कहा है. इसके साथ माना जा रहा है कि अमेरिका की आतंक के खिलाफ सबसे लंबी जंग खत्म हो जाएगी. असल में इस जंग की शुरुआत साल 2001 में हुई थी, जब उसने तालिबान के खात्मे के लिए अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजी. ये 9/11 आतंकी हमले के बाद का समय था. वहां की सरकार का मानना था कि अफगानिस्तान ही तालिबानियों की शरणस्थली है और यहीं पर अलकायदा से जुड़े लोग रहते हैं. वे अफगान पहुंचे और अपने सैन्य ठिकाने बना लिए.

9/11 के बाद से अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात थे- सांकेतिक फोटो

स्थानीय सैनिकों को देने लगा प्रशिक्षण वो आक्रामक कार्रवाइयों का दौर था. बाद में अमेरिका ने इस मॉडल को पक्का बनाने के लिए नया काम शुरू किया. वहां तैनात अमेरिकी सैनिक अफगानी सेना को ट्रेनिंग देने लगे ताकि वो आतंक का मुकाबला खुद ही कर सकें. तब जाकर अमेरिका धीरे-धीरे सैनिकों की अपनी फौज को वापस बुलाने लगा.
फैला अमेरिकी जनता में असंतोष  वापस बुलाने की सबसे बड़ी वजह सैनिकों के अपने परिवारों से दूरी के कारण आई अस्थिरता थी. जनता का मानना है कि अमेरिकी सैनिक बेवजह ही दशकों से युद्ध के हालात में रखे गए हैं. साथ ही इस असंतोष की एक और वजह ये भी है कि विदेशी जमीन पर सैनिकों की तैनाती का ज्यादातर खर्च अमेरिकी लोगों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता है. ये भी पढ़ें: Coronavirus: इलाज के वो तरीके, जो एकाएक होने लगे चलन से बाहर कितना टैक्स सैनिक बेस के लिए देना होता है शोध करने वाली संस्था RAND कॉर्पोरेशन के मुताबिक अमेरिकी टैक्सपेयर सालाना 10000 से 40000 डॉलर के लगभग टैक्स इसी मकसद से देते हैं. इनमें अमेरिका से विदेशी धरती, जहां सैनिक तैनात होंगे, वहां जाना, रहना, खाना, अस्पताल और अगर परिवार साथ हो, तो बच्चों के स्कूल का खर्च भी अमेरिकी टैक्सपेयर को देना होता है. जबकि इसका बहुत छोटा हिस्सा होस्ट देश देता है.

afghanistan US troops withdrawal

अमेरिकी जनता का मानना है कि अमेरिकी सैनिक बेवजह ही दशकों से युद्ध के हालात में रखे गए हैं- सांकेतिक फोटो (Photo- pikist)

मानवीय समस्याएं भी काफी ज्यादा पैसों के अलावा सैनिकों को कई मानवीय समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. जैसे चरमपंथी समूह कभी भी उनपर हमला कर देते हैं. अक्सर ये भी देखा गया है कि स्थानीय लोग चरमपंथियों के बहकावे में आकर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन की तरह देखते हैं. इस तरह से सैनिक विदेशी धरती पर एकदम अकेले पड़ जाते हैं. साथ में अगर परिवार हो तो उनपर भी खतरा रहता है और अगर अमेरिका में रहें तो भी अकेलापन झेलना पड़ता है. ये भी पढ़ें: Explained: क्या कोरोना की तीसरी लहर का आना तय है, कितनी खतरनाक होगी ये?  पाकिस्तान क्यों डरा हुआ  अब दशकों बाद अमेरिकी सैनिक वापस लौटने लगे हैं, लेकिन इस बीच पाकिस्तान को डर सता रहा है कि अफगानिस्तान से सटा होने के कारण उसके यहां भी अशांति फैल जाएगी. साल 2020 के अंत में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने लगातार कहा था कि अमेरिकी सेना का अफगानिस्तान छोड़ना गलत साबित होगा. बकौल खान, ऐसा करने पर लगभग दो दशकों से अफगानिस्तान में हो रही शांति की तमाम कोशिशों पर पानी फिर जाएगा.

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अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद आतंकी मजबूत हो जाएंगे और पाकिस्तान में भी आतंक फैला सकते हैं- सांकेतिक फोटो

क्या कहा इमरान खान ने  वॉशिंगटन टाइम्स में एक कॉलम में पाक पीएम इमरान खान ने इसे जल्दबाजी कह दिया. उनके मुताबिक पाकिस्तान ने भी अफगान में तालिबानियों का आतंक खत्म करने में अहम भूमिका निभाई है. वे कहते हैं कि 9/11 के बाद से 80,000 से ज्यादा पाक सैनिकों और आम पाकिस्तानी नागरिकों की जान इस शांति बहाली में गई. अब अचानक से अमेरिका ने अपने सैनिक वापस बुलाने का एलान कर दिया है. इससे शांति बहाल होने से पहले ही खत्म हो सकती है. ये भी पढ़ें: Explained: क्या है वाइट फंगस, जिसे ब्लैक फंगस से भी खतरनाक माना जा रहा है? साझा सीमा से चलते फैल सकता है आतंक इमरान सरकार को ये डर है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद आतंकी मजबूत हो जाएंगे और पाकिस्तान में आतंक फैलाएंगे. बता दें कि पाक और अफगानिस्तान लगभग 2500 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं जिसे डूरंड रेखा कहते हैं. इस सीमा पर और आसपास आएदिन तनाव होते रहते हैं. इसका असर इस्लामाबाद और काबुल पर भी दिखता है. कई बार दोनों ही देशों के राजदूतों आपस में बुरा व्यवहार कर चुके हैं.



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