रिश्ते, सपने और जिन्दगी की दास्तान है, अमेजन पर रिलीज चर्चित कोरियाई फिल्म ‘मिनारी’

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नई दिल्ली. एक कोरियन परिवार, अमेरिका के एक शहर से दूसरे शहर (आर्कन्सा) बसने के लिए आता है. पिता जैकब अपनी पत्नी से कहता है- ‘इस छोटे शहर में आने का सबसे बड़ा कारण इसकी मिट्टी है. इस शहर की मिट्टी सबसे बढ़िया है और इसका रंग भी सबसे अच्छा है’. जवाब मामूली सा जान पड़ता है, पर विस्थापन के कारण अपनी जड़ों से अलग हो चुका जैकब नए घर का चुनाव करते समय उस शहर की मिट्टी को अहमियत देता है, तब ये साधारण सा जवाब, पलायन के दर्द की गहराई से हमें अवगत कराता है.इस दर्द को भरने के लिए जैकब को मिट्टी के मलहम का ही एक आसरा दिखाई देता है. यह मिट्टी उसे उम्मीद देती है कि उसका जीवन और उसका परिवार इस नए शहर में मजबूती से जम जाएगा. प्रवासियों के लिए मिट्टी से संगत बैठ जाने का अर्थ जीवन में बरकत आने से है. ‘ली आइज़क चुंग’ द्वारा निर्देशित कोरियाई फिल्म ‘मिनारी’ (Minari) जब इस सुर के साथ शुरू होती है तो एक बेफिक्र तसल्ली देकर आश्वस्त कर जाती है कि इस फिल्म के साथ यात्रा पुर-सुकून देने वाली और सुखद रहेगी.

इस वर्ष कई प्रतिष्ठित फिल्म समारोह में सम्मानित और पुरस्कृत होने की वजह से यह फिल्म काफी चर्चा में रही. पिछले साल एक और कोरियाई फिल्म ‘पैरासाइट’ ने ऑस्कर पुरस्कारों की 92 वर्ष की परम्परा में एक नया इतिहास रचा था, जब ये फिल्म ऑस्कर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ख़िताब जीतने वाली पहली गैर-अंग्रेजी फिल्म बनी थी. इस सम्मान ने वैश्विक स्तर पर कोरियाई सिनेमा की गहरी और गंभीर उपस्थिति दर्ज कराई. अब मिनारी की सफलता ने कोरियाई सिनेमा की इस छवि को और भी पुख्ता कर दिया है.

भारत में हाल में ही ये फिल्म अमेजोन प्राइम पर रिलीज़ हुई . फिल्म में जैकब और उसकी पत्नी मोनिका अपने दो बच्चों एन और डेविड के साथ, अमेरिका के बड़े शहर कैलिफोर्निया को छोड़कर एक छोटे शहर आर्कन्सा आकर बसते हैं. जैकब मुर्गी व्यवसाय से जुड़ी एक कंपनी में नौकरी करता है. जहाँ उसका काम चूजों के जनांगों को देखकर मुर्गे और मुर्गियों की पहचान कर उन्हें अलग-अलग टोकरियों में डालना है. इस शहर में आने से पहले भी जैकब यही काम करता रहा है.

सालों से एक जैसी नौकरी करते करते वो अब ऊब चुका है, इसलिए आर्कन्सा में उसने ऐसी जगह को चुना, जहां घर के बाहर उपजाऊ ज़मीन हो. इस ज़मीन पर वो खेती कर पैसे कमाना चाहता है ताकि वो नौकरी छोड़ सके और परिवार को एक बेहतर जीवन दे सके. इस तरह नया शहर जैकब के लिए नई उम्मीद है और उसका खेत बदलाव की नई ज़मीन. इसके अलावा अपने मूल देश कोरिया को छोड़ने पर हुई मानसिक बैचनी के लिए ये खेत और शहर जैकब के लिए सुकून भरा ठौर ढूंढने की कोशिश भी है. जैकब से विपरीत मोनिका को ये नई जगह बिलकुल पसंद नहीं है. घर के नाम पर यहां एक डिब्बानुमा मकान है जो पहियों पर खड़ा है.बेटा डेविड दिल की बीमारी से जूझ रहा है, पर इस इलाके के आस पास कोई बड़ा अस्पताल नहीं है जहां इमरजेंसी की स्थिति में उसे ले जाया जा सके. सामाजिक तौर पर अकेले पड़ जाने का डर भी मोनिका के मन में है क्योंकि उनके पड़ोस में कोई भी कोरियाई परिवार नहीं है जिनसे वो घुल-मिल सके. पर कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आता है जब घर में नानी का प्रवेश होता है. नानी को खाना बनाना नहीं आता, ठीक से अंग्रेजी भी नहीं बोल सकतीं और टीवी पर डब्लू. डब्लू. एफ. की फाइट देखना उन्हें पसंद है और वो इस खेल को असल लड़ाई मानती हैं. यह नानी डेविड के मन में बसी नानी की छवि से बिलकुल मेल नहीं खाती. इसलिए वो नानी को पसंद भी नहीं करता.

नानी और पोते की नोक-झोंक, उनकी शरारतें, घुमक्कड़ी, पसंदगी-नापसंदगी और प्यार-दोस्ती, इस फिल्म के सबसे खूबसूरत और मजबूत हिस्से हैं. एक जगह डेविड नानी के साथ सोने से इनकार करते हुए कहता है कि मैं नानी के साथ नहीं सोऊंगा उनसे कोरिया की गंध आती है. ये पल जब भी फिल्म में आते हैं तो मन में कई तरह के अहसासों की फुरहरियां इत्र की तरह फैल जाती हैं. फ़िल्म के इन्ही प्रसंगों में आपको डेविड की मस्ती का विस्फोट भी दिखेगा, उसकी मासूमियत का अहसास भी होगा और उसके बचपन का चंटपना भी नज़र आएगा.नानी में आपको वृद्धावस्था का अक्खड़पन और उस अक्खड़पन के भीतर छुपा एक निश्चल बच्चा भी दिखाई देगा, जो अपने पोते डेविड का जिगरी यार है. दोनों के अभिनय में इतनी सहजता और ईमानदारी है कि आप अपने दादी -नानी के रिश्ते को एक बार ज़रूर महसूस करेंगे. यही वजह है कि नानी का किरदार निभा रहीं अभिनेत्री ‘जो जोंग-यूह’ को इस साल के कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले, जिसमें ऑस्कर और बाफ्टा के बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के पुरस्कार भी शामिल हैं. डेविड की भूमिका निभा रहे ‘एलन किम’ को भी इस साल ‘क्रिटिक चॉइस अवार्ड फॉर यंग एक्टर’ पुरस्कार से नवाज़ा गया. नानी-पोते के इस स्नेहहिल रिश्तों की बुनियाद में है मिनारी, जो इस फिल्म का शीर्षक भी है.

मिनारी का अर्थ है -एक तरह का पौधा
मिनारी का अर्थ है -एक तरह का पौधा, जो घास जैसा फैलता है. इसका सेवन सूप-सलाद में भी किया जाता है और इसमें औषधीय गुण भी होते हैं. फिल्म के निर्देशक ‘ली आइज़क चुंग’ कहते हैं मिनारी मेरे लिए एक रूपक की तरह है. इस पौधे की सबसे दिलचस्प बात ये है कि यह अपने दूसरे साल (सीजन) में मजबूती से बढ़ता है. ये बिना कुछ किए स्वतः फलता-फूलता है और मरने के बाद भी फिर उग जाता है. मिनारी की यही प्रवत्ति इस फिल्म का मूल तत्व है. इसलिए मेरे लिए ये काव्यात्मक पौधा है’.

फिल्म एक परिवार के आपसी रिश्तों, जीवन की रिवायती लय को तोड़कर बेहतरी के लिए संघर्ष करते परिवारजनों, नई राहों के लिए अन्वेषी बने रहने की आस्था और कई खट्टे मीठे पलों की एक लड़ी है. इस लड़ी को अगर आप एक फ्रेम में देखेंगे तो ये फ़िल्म एक मुकम्मल ज़िन्दगी दिखाई देगी. छोटे-छोटे प्रसंगों में आपके जीवन की सार्थकता नज़र आएगी. फिल्म में एक तरफ एक अटूट उदासी का अंधेरा भी नज़र आएगा, वहीं दूसरी तरफ एक महीन जिजीविषा का उजाला दिखाई देगा, जो इस विचार को और मजबूती देता है कि सहजता जब गूढ़ता के साथ आती है तो उसका अपना विशिष्ट कला सौंदर्य होता है. सिनेभाषा में मिनारी इसका एक अच्छा उदाहरण है.

(डिसक्लेमर: ये लेखक के अपने विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

मोहन जोशी रंगकर्मी, नाट्यकार

फ्रीलांस लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार स्नातक. एफटीआईआई पुणे से फिल्म रसास्वाद व पटकथा लेखन कोर्स. रंगकर्मी, नाट्यकार और इसके अलावा कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन व निर्देशन.

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