International Tea Day 2021: आओ तुम्हें चाय पर ले जाएं...

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सुबह की पहली किरण और उसके साथ उबलती कुछ खुशबूदार पत्तियां, जैसे इससे बेहतर कोई सुबह हो ही नहीं सकती. रात भर की भरपूर नींद हो या किसी कारणवश उजगरण, ज़ायके भरा यह प्याला रोम-रोम में ऊर्जा का संचार कर देता है. यह माना जाता है कि रेलगाड़ी के अलावा अंग्रेज़ों की भारत को सबसे बेहतरीन देन यही थी, चाय. जिस तरह क्रिकेट को हमारे देश में गली-गली में अपनाया गया है उसी तरह चाय भी किसी अफसर के बंगले से लेकर किसी छोटी सी गुमटी पर चाय पीते मजदूर को एकता के भाव में जोड़ती है. आज अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस (International Tea Day) पर आइये इस अद्भुत पेय के साथ कुछ विचारों को उतारा जाए.चाय, आखिर क्या है ऐसा इस चाय में जो दुनिया के कोने कोने में आपको इसके दीवाने मिल जायेंगे? खैर वैज्ञानिक ढंग से इसका विश्लेषण करें तो चाय में कैफीन पाया जाता है यह लगभग हम सभी जानते हैं लेकिन चाय में एक तरह का एमिनो एसिड भी पाया जाता है जिसे एल-थिएनिन कहते हैं, जो कि मानसिक और शारीरिक तनाव काम करने में मददगार होता है और हमें शांत करता है. शायद इसीलिए बड़ी से बड़ी बैठकों में चाय का मुख्य रूप से ख्याल रखा जाता है, बड़े-बड़े मसले अक्सर एक चाय की बैठक पर आसानी से हल हो जाते हैं. ये ही नहीं, दिन भर धूप में कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर से लेकर ऑफिस में घंटों फाइलों में दबे कर्मचारी तक सभी का चाय से एक प्रेम भरा नाता है. तनाव मांसपेशियों का हो या दिमागी या मनःस्थिति ठीक न हो, इस प्रेम के प्याले का “सुर्र” के साथ एक घूँट अंदर जाते ही सभी बत्तियां चालू हो जाती हैं.

यूँ तो चाय बनाने के अपने कई तरीके हैं, और हर तरीका अपने आप में नायाब और लाजवाब है. चाय का अपने प्रशंसकों के प्रति प्रेम तो देखिये वह अपने चाहने वाले के लिए हर रूप में सुलभ है. वैसे तो चाय के नजाने कितने ही प्रकार हैं लेकिन मुख्य रूप से इसके पांच वर्गों में विभाजित किया गया है, वाइट, ग्रीन, ऊलोंग, ब्लैक और पु-एर्ह. हेल्थ कॉन्शियस लोग इसका आनंद ग्रीन टी के रूप में लेते हैं.  यूरोप, अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में प्रायः चाय पत्ती को सिर्फ पानी में उबाल कर ही चाय का सेवन किया जाता है. मोरक्को में पुदीने के साथ चाय के फूलों को उबाल कर चाय बनायीं जाती है. यही नहीं भारत में भी चाय विविध प्रकारों में उपलब्ध है. भारत में आसाम चाय का सबसे बड़ा उत्पादक है. यहीं से आने वाली चाय देश के अलग अलग हिस्सों में जा कर अलग अलग रूप ले लेती है, जैसे कश्मीर में काहवा, केरला में सुलेमानी चाय और वह चाय जिसने सभी को अपना बनाया हुआ है वह है हमारी अपने मसाला चाय जो पूरे विश्व में “चाय-लाते” के नाम से जानी जाती है.

ऐसे तो चाय बनाने की विधि सामान्य है, थोड़ा पानी लीजिये उसमे चाय पत्ती डालिये, आवश्यकता अनुसार अधरक, लॉन्ग, कालीमिर्च, इलायची, पुदीना, दालचीनी इत्यादि अपनी पसंद के अनुसार उसमें डालें फिर थोड़ा दूध डाल कर उसे उबलने दें और फिर स्वादानुसार चीनी डाल कर उसे छान लें. लेकिन इसके अलावा भी एक तरीका है जिसमें एक पतेली में थोड़ा मौसम चढ़ाएं उसमें एक चम्मच किस्से डाल कर धीमी बातचीत पर घनघोर उबालें, स्वादानुसार संगत मिलाएं और छान लें, तैयार है एक गिलास चाय. यही कारण है की चाहे आप दो लोगों को एक जैसा सामग्री दे दें फिर भी चाय का स्वाद दोनों का अलग ही आएगा. यहाँ तक की कांच के गिलास और चीनी मिटटी के कप तक में स्वाद का अंतर आ जाता है. स्टील के गिलास में और कागज़ के बने डिस्पोजेबल कप दोनों में ही चाय का अलग स्वाद मिलता है.

वैसे अगर हम चाय के सन्दर्भ में बात करें और भारत में गली नुक्कड़ों से लेकर बड़ी सडकों तक मिलने वाली चाय की टपरियों या चाय के अड्डों के बारे में बात न करें तो यह विषय अधूरा ही माना जायेगा. हर ज़माने में चाय के इन अड्डों की एक विशेष जगह रही है. अक्सर इस जगह पर मिलने वाले दो अनजान व्यक्ति गहरे मित्र हो जाया करते हैं, जिनकी यह मित्रता हर चाय के साथ गहरी होती जाती है. इसी जगह पर अक्सर विभिन्न राजनैतिक दलों के समर्थक शांतिपूर्ण ढंग से ज्वलंत मुद्दों पर एक स्वस्थ बहस किया करते थे. घर से दूर रहने वाले लोगों के लिए यह जगह सिर्फ एक चाय के स्थल से कहीं ज़्यादा होती है.  यहीं से वह अपनी नयी व्यवस्थाओं के साथ साथ हर चीज़ का तंत्र खोज लेते हैं. इस जगह पर मिलने वाले बातोलेबाज़ अक्सर सारी दुनिया की खबर वहीँ बैठे बैठे आपके सामने हाज़िर कर देते हैं. अक्सर इन जगहों पर इस प्रेम भाव की गहमा – गहमी लगी रहती है, और यह टूट कर सन्नाटे की गूँज में बदल जाती है जब कोई इसी चाय की टापरी पर कॉफ़ी की मांग कर बैठता है.गौरतलब है कि चाय सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि इसका इसके चाहने वालों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव भी है. प्रसंग चाहे ख़ुशी का हो या दुःख का, चाय हर जगह आपका साथ देती है. सुबह उठने से लेकर देर रात हो रही अपनों के साथ महफ़िल में अचानक चाय के नाम सुनते ही सभी के मन में उमंग की एक लेहेर दौड़ जाती है. लम्बे सफर के बाद थकान मिटाने से लेकर, कड़ी दिमागी कसरत के बाद सर में हो रहे दर्द के इलाज तक के लिए चाय कारगर है. चाय की ही महिमा है कि बिरयानी से प्रेम में हारी इलायची को भी चाय ने अपनाया है. कहीं पढ़ा था कि कॉफ़ी पर तो मीटिंग्स हुआ करती हैं, मुलाकातें तो चाय पर ही होती हैं. चाय जैसे भगवन का दिया हुआ प्रसाद है, शायद इसीलिए कहते हैं “चाय को ना नहीं कहते पगले, पाप लगता है.” चाय पिएं और पिलाएं, आपसी सौहार्द बढ़ाएं, कोई अपना मिले तो गाना गायें “आओ तुम्हें चाय पर ले जाएं…..” (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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