कहीं प्रकृति तो कही वैक्सीनेशन बना हथियार, जानें बिहार के ‘कोरोना फ्री’ गांवों की कहानी


रजनीश चंद्र

पटना. बिहार में कोरोना के रफ्तार पर फिलहाल ब्रेक लगता दिख रहा है और जिंदगी सामान्य रूप से पटरी पर लौटती दिख रही है. राज्य में कोरोना (Corona in Bihar) की दूसरी लहर ने शहर के साथ-साथ गांवों में भी कहर बरपाया है. ग्रामीणों की बहुत बड़ी आबादी इससे प्रभावित हुई है लेकिन दूसरी ओर बिहार के अनेक गांव ऐसे भी हैं जहां कोरोना की इंट्री नहीं हो सकी. ग्रामीणों की सतर्कता, जागरुकता एवं कोविड नियमों के प्रति प्रतिबद्धता ने कोरोना को उन गांवों में फटकने नहीं दिया. आज न्यूज 18 हिन्दी आपको बिहार के ऐसे ही कुछ गांवों की कहानी बता रहा है जहां आपसी सामंजस्य और सहयोग के बलबूते कोरोना लोगों से कोसो दूर रहा.

प्रकृति से निकटता

पश्चिम चंपारण के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के समीप थारू बहुल सात गांव कोराना से मुक्त रहे. पिछले साल भी पहली लहर में ये गांव कोरोना से मुक्त थे. इस बार लोग और भी सतर्क हो गये. पेड़-पौधे की रक्षा करने वाले थारू प्रकृति को देवता मानते हैं. इनकी दिनचर्या पूरी तरह से संतुलित है. ग्रामीणों के अनुसार वे अहले सुबह उठते हैं और रात आठ बजे तक सो जाते हैं. प्राकृतिक चीजों का अधिक से अधिक सेवन करते हैं. शारीरिक श्रम भी अधिक करते हैं. इन लोगों ने सरकार की ओर से जारी गाइडलाइन का भी पूरी तरह पालन किया. बेवजह लोगों ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया. वहीं नेपाल सीमा से सटे महराजगंज के 32 गांवों में भी रहने वाले थारूओं ने अपने को कोरोना से बचाये रखने में सफलता पायी. दरअसल थारू जनजाति का पंरपरागत खानपान और प्राकृतिक वास कोरोना को परास्त करने में प्रभावी हथियार साबित हुआ.वनवासियों की जागरुकता

कैमूर पहाड़ी पर बसे जोंहा गांव से भी कोरोना दूर ही रहा. यहां साक्षरों की संख्या कम है, लेकिन कोरोना को लेकर जागरुकता में कोई कमी नहीं है. आलम यह है कि हर घर के बाहर साबुन, पानी, सैनिटाइजर की व्यवस्था है. ग्रामीण बताते हैं कि महामारी से बचाव के लिए लोगों ने बाहरी आदमी के प्रवेश पर रोक लगा दी. मास्क और दो गज की दूरी के नियम का सख्ती से पालन किया. गांव जंगल के बीच है तो लोगों को शुद्ध प्राकृतिक हवा भी मिलती रही.

विशाल वन बना वरदान

बक्सर के कचइनियां गांव को 77 साल पहले भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे ने विशाल वन क्षेत्र प्रदान किया था. आज उसी वन की बदौलत गांव कोरोना से मुक्त है. विनोबा भावे ने भूदान में मिली जमीन में बड़ी संख्या में पेड़ लगाए जो बाद में विशाल वन में बदल गया. ग्रामीणों के अनुसार ऑक्सीजन से परिपूर्ण इस वन के विशाल पेड़ों के नीचे वे लोग हर दिन योग करते हैं और ताजी हवा में टहलते हैं. साथ ही लोग कोरोना गाइडलाइन का भी बखूबी पालन करते हैं.

कोरोना जांच के बाद ही इंट्री

बांका के पंजवारा पंचायत के सिरादै गांव में भी एहतियात के तमाम उपायों के कारण ही कोरोना प्रवेश नहीं कर सका. बाहर से आने वाले लोगों के लिए कोरोना जांच अनिवार्य कर दिया गया. जांच में निगेटिव आने पर ही घर जाने की इजाजत थी. पॉजिटिव आने पर अस्पताल में भर्ती कराया जाता नहीं तो क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया जाता. ऐसी ही सतर्कता भागलपुर के भवनपुरा गांव में भी रही. इस गांव में भी पचास से ज्यादा कामगार बाहर से लौटे.लेकिन किसी को बिना कोराना जांच के गांव में नहीं आने दिया गया..पॉजिटिव पाए गए लोगों के लिए रहने, खाने-पीने की उचित व्यवस्था की गयी. गांव के युवा खासे सक्रिय रहे. युवाओं की टोलियां बनायी गई जो लोगों को कोरोना को लेकर जागरुक करती रही. खगड़िया के परबत्ता में भी चार गांव ऐसे हैं जो कोरोना मुक्त है.ग्रामीणों ने नियम बना दिया कि जो भी बाहर से आएगा, वह एक से दो सप्ताह तक अकेले में रहेगा.

टीकाकरण को बनाया हथियार

मिथिला पेंटिंग के लिए विख्यात मधुबनी के जितवारपुर गांव ने भी कोरोना को लेकर जागरुकता की मिसाल पेश की. कोरोना का एक भी मरीज गांव में नहीं है. ग्रामीणों ने कोरोना जांच के साथ-साथ टीकाकरण में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. यहां के लोगों ने टीकाकरण को लेकर फैली अफवाह को दरकिनार कर दिया और संदेश दिया कि कोरोना से बचाव के लिए टीकाकरण सशक्त माध्यम है. टीकाकरण को लेकर खगड़िया जिले के चौथम, महेशखूंट प्रखंड के कई गांवों में खासा उत्साह रहा. जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ ग्रामीण भी सजग रहे.गांव में नियमित रुप से सैनिटाइजेशन की व्यवस्था की गयी. नतीजतन वे कोरोना से दूर रहे.

ये तो कुछ गांवो की बानगी भर है. ऐसे अनेक गांव हैं, जो कोरोना को मात देने में सफल रहे. ये गांव कोरोना से कैसे लड़ा जाए और विजय प्राप्त किया जाए, इसकी सीख देते हैं.





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