कांग्रेस में ब्राह्मणों के ‘खेवनहार’ रहे जितिन प्रसाद ने थामा बीजेपी का हाथ, जानिए यूपी की राजनीति में इसके क्या हैं मायने


बीजेपी के हुए जितिन प्रसाद

Jitin Prasad Latest News: जितिन प्रसाद यूपी की ब्राह्मण राजनीति के खेवनहार माने जाते रहे हैं. पिछले एक साल से उन्होंने ब्राह्मणों को गोलबन्द करने के लिए कड़ी मशक्कत की है.

लखनऊ. देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए सियासी उठापठक शुरू हो गई है. ऐसे में बड़े-बड़े नेताओं का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने का सिलसिला भी शुरू हो गया है. इस लिस्ट में नया नाम जितिन प्रसाद (Jitin Prasada) का जुड़ गया है. उनका नाम कांग्रेस (Congress) के दिग्गज नेताओं में शुमार रहा है. अभी तक कांग्रेस को यूपी में जिन्दा करने की कवायद में जुटे जितिन प्रसाद उस बीजेपी खेमे में खड़े हो गये हैं, जिसने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखा है. राजनीति शायद इसी को कहते हैं. जितिन प्रसाद यूपी की ब्राह्मण राजनीति के खेवनहार माने जाते रहे हैं. पिछले एक साल से उन्होंने ब्राह्मणों को गोलबन्द करने के लिए कड़ी मशक्कत की है.

हालांकि, उनका कांग्रेस छोड़ने का फैसला बहुत चौंंकाने वाला नहीं है. प्रियंका गांधी वाड्रा के यूपी में सक्रिय होने के समय से ही जितिन प्रसाद पार्टी लाइन से कुछ कटे-कटे नजर आ रहे थे. पिछले साल जुलाई में तो यह हवा जोरों की उड़ी थी कि जितिन कांग्रेस छोड़ रहे हैं. उस समय राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत की तनातनी चरम पर थी. जितिन ने सचिन पायलट के लिए बहुत हमदर्दी दिखाई थी. हालांकि, तब उन्होंने पार्टी छोड़ने की अटकलों का खंडन कर दिया था, लेकिन आखिरकार वही हुआ जिसकी चर्चा थी. अब जितिन भगवा झंडा उठायेंगे.

पिता थे खांटी कांग्रेसी 

जितिन प्रसाद खानदानी राजनीतिज्ञ हैं. उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद खांटी कांग्रेसी थे. वह कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे. जितेंद्र प्रसाद राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के राजनीतिक सलाहकार भी थे. शाहजहांपुर के रहने वाले जितेन्द्र प्रसाद का कांग्रेस में मामला तब खराब हो गया जब वह पार्टी अध्यक्ष के लिए सोनिया गांधी के खिलाफ साल 2000 में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था. हार तय थी. दुखद ये रहा कि अगले ही साल 2001 में महज 62 साल की उम्र में वह चल बसे.ऐसा रहा कांग्रेस में सफरनामा

जितिन के पिता सोनिया गांधी के खिलाफ भले ही चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस में उनकी विरासत को तवज्जो मिलती रही. उनकी राजनीतिक विरासत को जितिन ने आगे बढ़ाया. साल 2004 में जितिन प्रसाद पहली बार शाहजहांपुर से सांसद बने. सांसद रहते वे कई संसदीय समितियों के सदस्य रहे. साल 2008 में मनमोहन सिंह ने उन्हें मंत्री बना दिया. जितिन पहली बार इस्पात मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाये गये. अगले साल 2009 में फिर चुनाव हुए. इस बार शाहजहांपुर की सीट सुरक्षित हो गयी. लिहाजा जितिन ने लखीमपुर खीरी की धौरहरा से चुनाव लड़ा. वह दोबारा जीत गए. मनमोहन सिंह ने उन्हें फिर से मंत्री बनाया. पहले वह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय फिर सड़क और परिवहन मंत्रालय और फिर मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे. इस तरह साल 2008 से 2012 तक वह मनमोहन सिंह की दोनों सरकारों में लगातार मंत्री रहे.

2017 में विधानसभा चुनाव भी हारे

केन्द्र से कांग्रेस सरकार की विदाई के साथ ही जितिन के भी दुर्दिन शुरू हो गए. साल 2014 का चुनाव वह धौरहरा से हार गए. इतनी बुरी हार हुई कि जितिन सीधे चौथी पोजिशन पर लुढ़क गये. लोकसभा में मिली करारी हार के बाद जितिन ने 2017 का यूपी विधानसभा का चुनाव तिलहर से लड़ा. यहां भी वे मात खा गये. तिलहर मुस्लिम और ब्राह्मण बाहुल्य सीट है. यहां भी वे जीत नहीं पाये. फिर 2019 में भी जितिन धौरहरा से लोकसभा का चुनाव लड़े, लेकिन फिर हार गए. इस तरह 2004 और 2009 में लगातार दो बार सांसदी का चुनाव जीतने के बाद जितिन तीन बार लगातार हारे. लगातार मिलती हार के कारण पार्टी में उनकी साख भी गिरती गई.

रविंद्रनाथ टैगोर की फैमिली से नाता

दिल्ली के मशहूर श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से एमबीए जितिन प्रसाद पेशे से किसान हैं.

विकीपीडिया से पता चलता है कि जितिन प्रसाद का नाता नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्र नाथ टैगोर की फैमिली से रहा है. जितिन की परदादी पूर्णिमा देवी रवीन्द्र नाथ टैगोर की भतीजी थींं, जबकि दादी पामेला देवी पंजाब की रॉयल कपूरथला राजघराने से थीं.









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