पलकी शर्मा का कॉलम: चीन पर नैतिक दबाव बनाना भारत के हित में ही होगा


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21 मिनट पहले

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पलकी शर्मा मैनेजिंग एडिटर FirstPost - Dainik Bhaskar

पलकी शर्मा मैनेजिंग एडिटर FirstPost

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत चीन को एक संदेश देने के साथ हुई है। भारत ने तिब्बत पर एक उच्चस्तरीय अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की। प्रतिनिधिमंडल ने धर्मशाला जाकर दलाई लामा से भेंट की। उद्देश्य था तिब्बतियों के प्रति समर्थन दिखाना।

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प्रतिनिधिमंडल में एक पूर्व अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी भी थीं, जिन्होंने चीनी राष्ट्रपति पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इतिहास दलाई लामा को याद रखेगा, लेकिन शी जिनपिंग को भुला दिया जाएगा। बीजिंग इससे स्पष्ट रूप से परेशान था। यह पूरी यात्रा चीन को उकसाने और तिब्बत में उसकी ज्यादतियों को उजागर करने के लिए थी।

इस साल फरवरी में भी अमेरिकी कांग्रेस ने एक नया विधेयक पारित किया था। इसमें कहा गया कि चीन को तिब्बती अधिकारियों के साथ बातचीत फिर से शुरू करनी चाहिए। बेशक इस कानून से चीन के कानों पर जूं नहीं रेंगने वाली। लेकिन यह अमेरिका की प्राथमिकताओं को दर्शाता है कि कैसे वे तिब्बत पर चीन को घेरना चाहते हैं।

यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया सहित कई अन्य लोकतंत्र भी इस पर अपना काम कर रहे हैं। और यहीं पर भारत को भी आगे बढ़ना चाहिए। नई दिल्ली अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है। आखिर भारत तिब्बती आंदोलन का घर है। दलाई लामा हमारे यहां ही रहते हैं। तिब्बती सरकार भी यहीं पर स्थित है। इसके बावजूद एक तरह की दुविधा है।

ऐसा क्यों है, यह समझने के लिए हमें तिब्बत के साथ भारत के इतिहास को समझना होगा। हम लंबे समय तक पड़ोसी हुआ करते थे। तिब्बत एक अलग देश हुआ करता था, जो भारत और चीन के बीच एक बफर-स्टेट की तरह था। लेकिन 1950 में यह बदल गया, जब चीन ने तिब्बत में सैनिक भेजकर पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और इसे चीन का हिस्सा बना लिया।

इसने भारत के लिए एक चुनौती खड़ी कर दी। अचानक तिब्बत के साथ हमारी सीमारेखा चीन के साथ सीमारेखा बन गई। 1954 में, नई दिल्ली ने चीन के कदम को मान्यता दी और स्वीकार किया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। लेकिन 1959 में दलाई लामा भारत चले आए। उस समय पं. जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। उन्होंने दलाई लामा और उनके अनुयायियों को शरण दी और वे तभी से यहां रह रहे हैं।

अब भारत खुद को एक अनोखी स्थिति में पाता है। एक तरफ, भारत तिब्बत पर चीन के नियंत्रण को स्वीकार करता है। दूसरी तरफ, वह निर्वासित तिब्बती सरकार की मेजबानी भी करता है। यह एक कठिन स्थिति लग सकती है, लेकिन इसमें एक फायदा भी है। नई दिल्ली तिब्बत का इस्तेमाल चीन पर दबाव बनाने के लिए कर सकती है। इस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पर ही विचार करें। भारत की मदद के बिना इस तरह की यात्रा नहीं की जा सकती थी।

सवाल यह है कि भारत को अपनी इस अनोखी स्थिति का क्या करना चाहिए? अपने पहले कार्यकाल में मोदी ने इस दिशा में सकारात्मक शुरुआत की थी। उन्होंने 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में कई नेताओं को आमंत्रित किया था। इनमें निर्वासित तिब्बती प्रधानमंत्री भी शामिल थे।

इसे चीन के लिए एक संदेश के रूप में देखा गया था। लेकिन 2019 और 2024 के शपथ ग्रहण समारोहों में तिब्बतियों को ऐसा कोई निमंत्रण नहीं दिया गया। हालांकि एक अलग तरह की पहल हुई है। 2021 में मोदी ने दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर बधाई दी।

प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनका पहला ऐसा संदेश था। यह सात साल के कार्यकाल के बाद आया। तब से यह एक परंपरा बन गई है। दलाई लामा का अगला जन्मदिन 6 जुलाई को है। वे फिलहाल घुटने की सर्जरी के लिए अमेरिका में हैं।

प्रधानमंत्री मोदी शायद फिर से उनसे संपर्क करेंगे। लेकिन इस बार उन्हें एक कदम आगे जाना चाहिए। वे दलाई लामा से निजी रूप से भेंट भी कर सकते हैं। वैसे भी, ऐसा लंबे समय से नहीं हुआ है। पिछली बार ऐसी मुलाकात 2010 में हुई थी, जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

चीन भारतीय क्षेत्र पर दावा करता रहता है और वह केवल ताकत की भाषा समझता है। इसलिए भारत को बीजिंग पर दबाव बनाना चाहिए। ताइवान पर हमारी नीति को ही देखें। कागज पर तो यह वन-चाइना पॉलिसी है, लेकिन भारत ने इसे धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है। मोदी के तीसरे कार्यकाल के बाद ताइवान के राष्ट्रपति ने उन्हें बधाई दी और भारतीय प्रधानमंत्री ने उन्हें जवाब भी दिया। यदि ताइवान नीति को कमजोर किया जा सकता है, तो तिब्बत नीति को क्यों नहीं?

हम तिब्बती आंदोलन को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने के लिए एक अच्छी स्थिति में हैं, चाहे यह सम्मेलनों की मेजबानी करना हो या विदेशी प्रतिनिधिमंडलों को आमंत्रित करना या तिब्बत को भारत के कूटनीतिक एजेंडे में शामिल करना।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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