Thursday, May 14

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जियो–फेसबुक डील पर रिलायंस को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने सेबी का 30 लाख रुपये जुर्माना बरकरार रखा

नई दिल्ली: रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। जियो–फेसबुक डील को लेकर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा लगाए गए 30 लाख रुपये के जुर्माने के खिलाफ कंपनी और उसके दो शीर्ष अधिकारियों द्वारा दायर अपील को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया है।

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क्या है पूरा मामला?

जियो–फेसबुक सौदे से जुड़े एक महत्वपूर्ण पहलू पर सेबी ने आरोप लगाया था कि रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इस डील से संबंधित अप्रकाशित मूल्य–संवेदनशील जानकारी (UPSI) का शेयर बाजार को समय पर खुलासा नहीं किया।
यह जानकारी पहले मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई, जबकि नियमानुसार कंपनी को तुरंत एक्सचेंज को सूचित करना चाहिए था।

इस लापरवाही को गंभीर मानते हुए सेबी ने

  • RIL,
  • सावित्री पारेख (कंप्लायंस अधिकारी)
  • के. सेथुरमन
    पर संयुक्त रूप से ₹30 लाख का जुर्माना लगाया था।

SAT ने भी बरकरार रखा था जुर्माना

रिलायंस ने सेबी के फैसले को प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) में चुनौती दी थी, लेकिन SAT ने भी 2 मई 2025 को सेबी के आदेश को सही ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान माना कि—

  • SAT का निर्णय पूरी तरह उचित है
  • इसमें दखल देने की कोई वजह नहीं
  • सेबी की कार्रवाई नियमानुसार है

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला ऐसा नहीं जिसमें किसी कानूनी व्याख्या पर पुनर्विचार की जरूरत हो। कोर्ट ने इस प्रकार रिलायंस की अपील को खारिज करते हुए सेबी के निष्कर्षों को प्रभावी रूप से पुष्टि प्रदान कर दी।

सेबी की मुख्य आपत्ति क्या थी?

सेबी के निर्णायक अधिकारी ने जून 2022 में निष्कर्ष निकाला था कि—

  • रिलायंस ने इनसाइडर ट्रेडिंग रेगुलेशंस के सिद्धांतों का उल्लंघन किया
  • डील से जुड़ी संवेदनशील जानकारी समय पर सार्वजनिक नहीं की गई
  • यह निवेशकों के हितों के खिलाफ था

क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?

  • बड़े कॉरपोरेट्स के लिए संदेश कि संवेदनशील जानकारी को समय पर उजागर करना आवश्यक है
  • बाजार की पारदर्शिता और निवेशकों की सुरक्षा को लेकर सेबी के सख्त रुख को मजबूती
  • जियो–फेसबुक जैसी हाई-प्रोफाइल डील पर भी नियामक ढील देने को तैयार नहीं

यह फैसला बाजार में स्पष्ट संकेत देता है कि किसी भी बड़ी कंपनी को पारदर्शिता के नियमों से छूट नहीं मिल सकती।

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