
नई दिल्ली: दिसंबर में भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ गई है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं – अमेरिका-भारत व्यापार समझौते का टलना, बढ़ता व्यापार घाटा और रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा को लेकर बनी नकारात्मक धारणा। इस ‘ट्रिपल फैक्टर’ के चलते भारतीय बाजार का प्रदर्शन फीका रहा, जबकि एशियाई साथियों जैसे चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और हांगकांग के सूचकांक चमकदार रिटर्न दे रहे हैं।
एशियाई बाजारों में मुनाफावसूली
जापान में 10 साल की बॉन्ड यील्ड बढ़कर 1.95% हो गई है। इससे येन कैरी ट्रेड में उलटफेर की संभावना बढ़ी है। जापान में महंगाई बढ़ने और सरकार के नए प्रोत्साहन पैकेज के कारण सरकारी कर्ज बढ़ सकता है। इस स्थिति में निवेशक अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए एशियाई बाजारों में मुनाफावसूली कर रहे हैं। इस साल अब तक निक्केई, हेंगसेंग, कोस्पी और शंघाई सूचकांकों ने क्रमशः 27.5%, 29.5%, 73.7% और 16% डॉलर रिटर्न दिया है।
भारत का प्रदर्शन
भारतीय शेयर बाजार ने डॉलर में लगभग 10% रिटर्न दिया, जबकि रुपये में 5.7% की गिरावट दर्ज की गई। विदेशी निवेशक एशियाई संपत्तियों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं, जिससे भारत के बाजार पर दबाव बना हुआ है।
व्यापार और मुद्रा दबाव
रुपये की अस्थिरता बढ़कर 90.4 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गई है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी से निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ रहा है और व्यापार घाटा बढ़ रहा है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है और कुल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा इसे प्रभावित करता है।
भविष्य का अनुमान
विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापार समझौते में देरी से 2026 में कंपनियों की कमाई और शेयर बाजार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि, हालिया फेड की 0.25% दर कटौती से बाजार में मामूली सुधार आया है, लेकिन स्थायी सकारात्मक प्रभाव सीमित लग रहा है।
निष्कर्ष: भारत का शेयर बाजार इस समय वैश्विक और घरेलू कारकों के मिश्रित दबाव में है। अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में तेजी और विदेशी निवेशकों की धारणा सुधारने पर ही निकट भविष्य में बाजार की चमक लौट सकती है।