विदिशा से ब्युरो चीफ शोभित जैन की रिपोर्ट :

“धर्म का प्रवेश तभी हो सकता हैं, जव हमारा मन निर्मल निश्चल,एवं निर्भय हो, निर्भयता ,साहस और निश्चलता जिसके पास होती हें,उसकी जीत निश्चित होती हैं! उपरोक्त उदगार् मुनि श्री कुंथुसागर जी महाराज ने अरहंतविहार जैन मंदिर में व्यक्त किये!* उन्होंने कहा *जिसके अंदर संयम के संस्कार होते हें, वह किसी से नहीं डरता भय रहित होकर वह कम पुरुषार्थ में ही अपना कार्य कर लेता हें!* मूकमाटी महाकाव्य में आचार्य श्री कहते हें कुम्भकार पानी निकालने के लिये कुये के अंदर पानी की वाल्टी विवेक के साथ नीचे उतारता हें, जिससे जलचर जीवों का घात न हो, मुनि श्री ने कहा कि एक संयमी जीव भले ही धीमी गति से कार्य करता हें, लैकिन विवेक और धैर्य के साथ अपना कार्य करता हैं!और उसमें विफल नहीं होता! जव कर्म का उदय होता हैं तो आपको अपने परिणामस्वरूप ही सफलता/ असफलता मिलती हें, उन्होंने कहा कि जिसमें आपकाजीवन सुरक्षित हो, आपका भला हो वह कार्य करना चाहिये! जो संसार रुपी कूप से निकलना चाहते हैं, वही धर्म की शरण में आता हैं, उस संकल्पिता मछली की शांत आंखें ऊपर देखती हें ,उसे वह वाल्टी एक यान सा दिखा लिखा हुआ था “धम्मो दया- विसुध्दो” तथा “धम्मं सरणं गच्छामि” उस मछली के मन में विचार आता हें, धर्म दया से विशुद्ध उस वाल्टी में वह संकल्पिता मछली प्रवेश कर जाती हैं, देव, शास्त्र और गुरु ही अशरणों की शरण है, महा- आयतन हैं! जिससे हमारा सम्यक दर्शन पुष्ट हो वह आयतन कहलाता हैं! मुनि श्री ने कहा कि जिस दिन जन्म हुआ था उसी दिन मौत के हो गये थे हस्ताक्षर! प्रतिक्षण हमारा मरण चल रहा हें, संसार में और कोई भी शरण भूत नहीं हें, वैर भाव भी सजातीय वंधुओं में ही होता हें एक छोटी मछली वडी़ मछली को निगल जाती हें, श्वान को देखकर श्वास भोंकता हें, एक सजातीय वंधु को देखकर जो भोंकता हें, गुर्राता हें तो आप समझना कि आप इंसान के रूप में श्वान हैं! मूकमाटी में आचार्य गुरूदेव कहते हें “दुनिया में उससे वडा़ कोई दोस्त नहीं होता, सव जुदा होते हैं लेकिन धर्म कभी जुदा नही होता! अक्सर देखा जाता हैं कि ईष्या, और द्वैष का भाव इंसानों में ही देखा जाता हैं! उन्होंने कहा कि भले ही आप भारत में महाभारत करो लेकिन जव जव भी राष्ट्रीयता की वात आए अपने राष्ट्र के साथ रहना चाहिये! जंहा धर्म की वात आए वंहा पर आपके मत मतांतर अलग नहीं होंना चाहिये!क्यों कि अंत समय में अपनी ही जाति काम आती हें, वाहरी लिखावट- और भीतरी लिखावट एक जैसी मिल जाए तो फिर कहना ही क्या??? वरना मूंह में राम वगल में छुरी” मुनि श्री ने कहा कि मच्छर न वनो, तन मन धन से समर्पित हो जाओ! वगुलाई भक्ती मत करना एक मात्र आपका धर्म ही आपके जीवन का सहारा हैं, इसलिये आपसे पूज्य गुरूदेव कह रहे हैं ” जो धर्म की शरण में रहता हैं, वह अपना आत्मकल्याण कर लेता हैं! धर्म का कभी नाश नहीं होता!*