बतौर शास्त्रीय संगीतकार के रूप में भारत ही नहीं वरन विश्व में अपनी एक पहचान स्थापित करने वाले संस्कृत में मन्त्रों व श्लोकों में अपनी एक अलग जगह बनाने वाले शास्त्रीय संगीतकार पंडित रतन मोहन शर्मा मेवातीघराना से सम्बन्ध रखते है श्री शर्मा का जन्म 14 जून 1971 को हुआ। ख्याल, टप्पा, भजन, राजस्थानी फोक तराना, हवेली, संगीत, शैली पेश करने वाले श्री शर्मा ने कई सारे एल्बम भी जारी किये जिनमे प्रमुख है – मेरे भगवान श्री राम, मेरे गुरु- श्री हनुमान, गायत्री माँ आदि के साथ ही राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई अवार्ड्स से नवाजे भी गए है। ऐसे शक्शियत से जब सच्चा दोस्त समाचार प्रतिनिधि अनामिका चौरसिया ने फोन पर मुलाकात की तो जानिए क्या कहते है श्री शर्मा उन्ही की जुबानी.

अनामिका – पंडित जी नमस्कार कैसे है आप?
रतन जी – नमस्कार, बढ़िया है,
अनामिका – पंडित जी आज हम आपसे संगीत के क्षेत्र से सम्बंधित हमारे पाठकों के लिए आपसे कुछ राज की बात जानना चाहते है तो शुरू करे हम आपसे कुछ आपके संगीत जीवन से जुड़े प्रश्न.
रतन जी – जी बिलकुल पूछिए आप क्या पूछना चाहते है,
अनामिका प्रश्न – तो रतन जी सबसे पहले आप ये बताये आज आपको इस मुकाम पर लाने वाले आपके गुरु कौन है ?
रतन जी – मेरे गुरु पद्मविभूषण संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज जी हैं.
अनामिका प्रश्न – आपका संगीत जगत में कैसे आना हुआ?
रतन जी – ऐसा है जब मैं 10 साल का था तब मेरे मामा भी और गुरु जी भी रहे पंडित जसराज जी के भाई एवं जतिन ललित जी में पिताजी पंडित प्रताप नारायण जी ने मुझे मुम्बई लेकर आये। बस वही से मेरे गाने की शुरुआत हुई।
अनामिका प्रश्न – पद्मविभूषण संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज जी ने आपको संगीत के क्षेत्र में कैसे ट्रीट किया?
रतन जी – पद्मविभूषण संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज जी ने मुझे एक शिष्य के तरह ट्रीट किया मैं भांजा जरूर हूँ मगर संगीत सीखते समय उन्होंने शिष्य के तरह सिखया, घर में बिलकुल एक साथ रहते थे मजाक मस्ती भी चलती थी मगर संगीत शिक्षा के समय एक आनुशासन में रखा, गुरूजी ने मुझे हर प्रोग्रम में मंच पर अपने साथ रखा। मंच पर गुरूजी के साथ बैठने के चलते स्टेज का जो डर था वो उनके साथ रहकर खत्म हुआ और बहुत कुछ स्टेज के सामने रह कर सिख मिली.
अनामिका प्रश्न – संगीत के क्षेत्र में आपका भी बहुत बड़ा योगदान है, आज इस संगीत के क्षेत्र में आकर आप को क्या लगता है। संगीत यात्रा कहा तक सफल रही हैं?
रतन जी – संगीत बहुत बड़ा महासागर है, उसको पार करना सोच ही नही सकते एक बार जब बादशाह अखबर ने तानसेन जी को कहा था, कि आप तो सब गाना को जानते हो ऐसा कुछ भी नहीं जिसे आप नहीं जानते तो तानसेन जी ने जबाब दिया था नही संगीत बहुत बड़ा महासागर है। मैंने तो ऊँगली डुबोई है, इतने बड़े गायक ऐसा बोल रहे तो हम किस खेत की मूली है।
अनामिका प्रश्न – आपको संगीत जगत में अपनी छवि स्थापित करने में कौन कौन सी परेसानी का सामना करना पड़ा, और कैसे शुरू हुआ संगीत के महाकुम्भ का यह सफर?
रतन जी – जी बिलकुल बहुत साडी परेशानियों का सामना मुझे भी करना पड़ा और मुझे आज भी याद ही जब हम लड़को जी आवाज बदलती है तब परेशानियां बहुत और उस दौर में मुझे गुरूजी ने बखूबी संभाला. जब मैं गॉव से मुम्बई आया तो गांव के गाने ही गाता था, गुरूजी ने कहा चुप रहो सुंनो पहले संगीत में एक प्रकार के संस्कार होने चाहिए। मैं सिर्फ सुनता रहा उधर से संगीत यात्रा शुरू हुई। जैसा की मेने बताया आपको जब लड़के बड़े होते समय के साथ साथ उनकी आवाज बदलती मेरे साथ भी ऐसा हुआ, मैं चिल्ला-चिल्ला कर गाने की प्रैक्टिस जोर जोर से करने लगा। गुरूजी ने बोला क्या कर रहा क्लासिकल नही गाना क्या? तब समझ में आया शास्त्रीय संगीत को गाना तो आवाज ख़राब नही करना फिर मेने रियाज शुरू किया सा-रे-गा- मा-पा बहुत रियाज किया, अच्छे ढंग से रियाज ना हो तो आवाज में खूबसूरती नही आती।
अनामिका प्रश्न – कभी गुरूजी ने शाबासी दी या कोई कॉम्प्लीमेंट दी संगीत क्षेत्र में
रतन जी – नही कभी नही कोई गुरु अपने शिष्य को शाबासी नही देते उन्हें सिर्फ अपने शिष्य को ओर अच्छा करने को ही बोलते है। हाँ दुसरो से जरूर बोलेंगे इसने अच्छा किया, मगर शिष्य को सिर्फ और मेहनत का बोलते है।
अनामिका प्रश्न – जीवन के 45 साल पार करके आज कैसे फील हो रहा, कैसे अनुभव कर रहे?
रतन जी – अभी तो ऐसा लग रहा की कुछ नही किया ओर करना जब छोटे था, सोच कर हँसी आती थी जब लोग बोलते थे, जीवन बहुत छोटा है। मगर अब लगता सुच मुच जीवन छोटा संगीत के लिए।
अनामिका प्रश्न – आज संगीत को लेकर कई तरह के प्रोयग हो रहे हैं कई कलाकार अपने एल्बम जारी कर रहे है। इन सब की किस तरह देखा जाना चाहिए?
रतन जी – ये मेरी दृष्टि से किसी बड़ी बहस का विषय नही है। नए कलाकार ने अपने स्तर पर मेहनत करके अपनी जगह बनाई। शास्त्रीय संगीत हर प्रकार के लोग नही सुन सकते कई कलाकार ने अपना काम के जरिये शास्त्रीय संगीत को बढ़ाया है। मिडिया ने भी बहुत सपोर्ट कर रहे है। सच्चा दोस्त के संस्थापक श्री अशोक जी लुनिया का शास्त्रीय कलाकार को आगे लेन में बहुत बढ़ा योगदान था और उनके अधूरे काम को विनायक जी पूरा कर रहे है. हम जैसे कलाकारों को जनता के बिच में बनाये रखने में सच्चा दोस्त का बहुत बढ़ा योगदान रहा है.
अनामिका प्रश्न – एक कलाकार अपने जीवन की इतनी लम्बी पारी खेलने के बाद उसकी असली पूंजी श्रोताओं का प्यार और अवार्ड ही होता है तो आपके अवार्ड लाइफ के बारे कुछ बताये…
रतन जी – कई अवार्ड्स मिले मुझे शंकर रॉ अवार्ड, पंडित जसराज ट्रॉफी, मेवाती घराना गौरव पुरुस्कार, आचार्य वरिष्ठ, ई.वाफ अवार्ड आदि मिले हुए।
अनामिका प्रश्न – क्या अपने कभी पद्म पुरस्कार के लिए तैयारी नहीं की?
रतन जी – अप्लाई किया था, मगर आया नही अभी तक काम बहुत किया मैने संगीत क्षेत्र में संस्कृत भाषा को पॉपुलर मेरे गाने 80% संस्कृत भाषा में है। गायत्री मंत्र, महामृत्युंजन आदि।
अनामिका प्रश्न – रियलिटी शो में बहुत कम कैंडिडेट शास्त्रीय संगीत के आते है और जो विजेता रहते है वो भी चाँद दिनों में ईद के चाँद हो जाते है ऐसा क्यों ?
रतन जी – आज कल रियलिटी शो में जो बच्चे आते उन्हें इतनी प्रसिद्धि मिलती है। सीखते नही गुरु की बात नही मानते उन्हें लगता कि कर लेंगे। मगर ऐसा नही है जब तक जब तक संगीत सीखते नही गुरु के साथ रियाज करना जरुरी है। संगीत गुरुमुख विद्या है.
अनामिका प्रश्न – मेवाती घराना क्या है और कौन – कौन संगीतकार है मेवाती घराना में?
रतन जी – मेवाती घराना एक स्टाइल है, 1880 की बात है जब अलग अलग घराना बन रहे थे जैसे ग्वालियर घराना बना आगरा घराना बना तब से ही उस्ताद घग्गे नज़ीर खान साहब जोधपुर उन्होंने अपने मेवात का ही नाम दिया। उस्ताद घग्गे नज़ीर खान साहब से पहले गायक पंडित नत्थूलाल से पंडित मोतीराम और उनसे पंडित मनीराम, पंडित जसराज जी से मुझे संगीत की तालीम मिली.
अनामिका प्रश्न – भारतीय शास्त्रीय संगीत को किस रूप से देखा जाता कौन सी धुन्न पर आधारित है?
रतन जी – संगीत बहुत बड़ा है, दो विधाए है और कोई देश में इतना संगीत नही है। पहले देश भारत है। उत्तर भारतीय और दक्षिण भारती जो हजारो वर्षो से चला आ रहा हैं, क्रिस्टल म्यूजिक से जुड़ा हुआ हैं।
अनामिका प्रश्न – भारतीय संगीत को वेस्टर्न म्यूजिक ऐसा कौन सा तत्व है जो अलग करता है?
रतन जी – भारतीय और वेस्टर्न कोई छोटा कोई बड़ा नही, दोनो बराबर एक समान है। वेस्टर्न संगीत पुरे शरीर को नाचता है और भारतीय संगीत आत्मा को नाचता है यह बहुत बड़ा फर्क है।
अनामिका प्रश्न – आपका पहला भजन या गीत बताइये.
रतन जी – चुंदरी मेरी निर्मल के बलराम।